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नए आपराधिक कानूनों की मुख्य विशेषताएँ


नए आपराधिक कानूनों में शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने वाले प्रावधान शामिल किए गए हैं। इन कानूनों की मुख्य विशेषताएँ अनुलग्नक में दी गई हैं।

जेलों में भीड़भाड़ कम करने के लिए, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) में निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं:

i. बीएनएसएस की धारा 290 में, आरोपी का अभियोजक के साथ समझौता करना (प्ली बार्गेनिंग) समयबद्ध बनाया गया है और प्ली बार्गेनिंग के लिए आवेदन आरोप तय होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर किया जा सकता है।  बीएनएस की धारा 293 के अंतर्गत मामले का पारस्परिक रूप से संतोषजनक निपटारा करने के लिए, जहाँ अभियुक्त ने पहली बार अपराध किया है और उसे पहले कभी किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराया गया है, न्यायालय ऐसे अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिए निर्धारित दंड का एक-चौथाई/छठा भाग दंड दे सकता है।

ii. बीएनएसएस की धारा 479 में विचाराधीन कैदी को हिरासत में रखने की अधिकतम अवधि निर्धारित की गई है। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि जहाँ कोई व्यक्ति पहली बार अपराध करता है (जिसे पहले कभी किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराया गया है), उसे न्यायालय द्वारा मुचलके पर रिहा किया जाएगा, यदि उसे कानून के तहत ऐसे अपराध के लिए निर्दिष्ट कारावास की अधिकतम अवधि की एक-तिहाई अवधि तक हिरासत में रखा गया है। इसके अतिरिक्त, इस संबंध में न्यायालय में आवेदन करना जेल अधीक्षक का कर्तव्य होगा।

iii. पहली बार, सामुदायिक सेवा को दंडों में से एक के रूप में पेश किया गया है।

नए आपराधिक कानूनों की मुख्य विशेषताएँ

नए आपराधिक कानून नागरिक-केंद्रित, अधिक सुलभ और कुशल न्याय प्रणाली बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। नए आपराधिक कानूनों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

A. पीड़ित-केंद्रित प्रावधान

i. घटनाओं की ऑनलाइन रिपोर्ट: अब कोई व्यक्ति पुलिस थाने जाए बिना, इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से घटनाओं की रिपोर्ट कर सकता है। इससे रिपोर्टिंग आसान और त्वरित हो जाती है, जिससे पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई संभव हो जाती है।

 ii. किसी भी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करें: ज़ीरो एफआईआर की शुरुआत के साथ, कोई भी व्यक्ति किसी भी पुलिस थाने में, चाहे उसका क्षेत्राधिकार कुछ भी हो, प्राथमिकी दर्ज करा सकता है। इससे कानूनी कार्यवाही शुरू करने में होने वाली देरी समाप्त हो जाती है और अपराध की तत्काल रिपोर्ट सुनिश्चित होती है।

iii. एफआईआर की निःशुल्क प्रति: पीड़ित को एफआईआर की निःशुल्क प्रति प्राप्त करने का अधिकार है, जिससे कानूनी प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित होती है।

iv. गिरफ्तारी पर सूचना देने का अधिकार: गिरफ्तारी की स्थिति में, व्यक्ति को अपनी स्थिति के बारे में अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को सूचित करने का अधिकार है। इससे गिरफ्तार व्यक्ति को तत्काल सहायता और सहयोग सुनिश्चित होगा।

v. गिरफ्तारी की जानकारी प्रदर्शित करना: अब प्रत्येक पुलिस थाने और जिले में एक नामित पुलिस अधिकारी होना अनिवार्य है, जो एएसआई के पद से नीचे का न हो और सभी गिरफ्तार व्यक्तियों की जानकारी अब प्रत्येक थाने में प्रमुखता से प्रदर्शित की जाएगी। इससे अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा होती है और पुलिस द्वारा हिरासत में हिंसा और अवैध हिरासत की घटनाओं में कमी आती है।

vi. पीड़ितों को प्रगति संबंधी अद्यतन सूचना: पीड़ितों को 90 दिनों के भीतर अपने मामले की प्रगति की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। यह प्रावधान पीड़ितों को कानूनी प्रक्रिया से अवगत और संबद्ध रखता है, जिससे पारदर्शिता और विश्वास बढ़ता है।

vii. पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज़ों की आपूर्ति: अभियुक्त और पीड़ित दोनों को 14 दिनों के भीतर प्राथमिकी, पुलिस रिपोर्ट/आरोपपत्र, बयान, स्वीकारोक्ति और अन्य दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने का अधिकार है।

viii. गवाह संरक्षण योजना: नए कानून सभी राज्य सरकारों को गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कानूनी कार्यवाही की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए गवाह संरक्षण योजना लागू करने का निर्देश देते हैं।

ix. पुलिस थाने जाने से छूट: महिलाओं, 15 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों, 60 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों और दिव्यागजन या गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को पुलिस थाने जाने से छूट दी गई है।

x. बीएनएसएस की धारा 360 में अभियोजन से हटने से पहले पीड़ित की सुनवाई अनिवार्य है। पीड़ित के सुनवाई के अधिकार को वैधानिक मान्यता आपराधिक न्याय प्रणाली के न्याय-केंद्रित दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।  मामलों की वापसी से संबंधित कार्यवाही में पीड़ित की अनिवार्य सुनवाई से न्याय प्रणाली अपराध से सीधे प्रभावित लोगों की आवश्यकताओं और चिंताओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है।

 B. महिला एवं बाल संरक्षण के प्रावधान

i. बीएनएस के नए अध्याय-V में महिलाओं और बच्चों के साथ अपराधों को अन्य सभी अपराधों पर वरीयता दी गई है।

ii. बीएनएस में, सामूहिक बलात्कार की नाबालिग पीड़ितों के लिए आयु का अंतर समाप्त कर दिया गया है। पहले 16 वर्ष और 12 वर्ष से कम आयु की लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए अलग-अलग दंड निर्धारित थे। इस प्रावधान को संशोधित किया गया है और अब अठारह वर्ष से कम आयु की लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है।

iii. महिलाओं को परिवार के एक वयस्क सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है जो सम्मन किए गए व्यक्ति की ओर से सम्मन प्राप्त कर सकती हैं। पहले के 'किसी वयस्क पुरुष सदस्य' के संदर्भ को 'किसी वयस्क सदस्य' से बदल दिया गया है।

iv. पीड़िता को अधिक सुरक्षा प्रदान करने और बलात्कार के अपराध से संबंधित जाँच में पारदर्शिता लागू करने के लिए, पुलिस पीड़िता का बयान ऑडियो-वीडियो माध्यम से दर्ज करेगी।

v. महिलाओं के साथ कुछ अपराधों के लिए, जहाँ तक संभव हो, पीड़िता का बयान महिला मजिस्ट्रेट द्वारा और उसकी अनुपस्थिति में पुरुष मजिस्ट्रेट द्वारा महिला की उपस्थिति में दर्ज किया जाना चाहिए ताकि संवेदनशीलता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके और पीड़ितों के लिए सहायक वातावरण तैयार किया जा सके।

vi. चिकित्सकों को बलात्कार पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट 7 दिनों के भीतर जाँच अधिकारी को भेजना अनिवार्य है।

vii. यह प्रावधान किया गया है कि पंद्रह वर्ष से कम आयु के या 60 वर्ष (65 वर्ष से पहले) से अधिक आयु के किसी भी पुरुष व्यक्ति, महिला, मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यागजन या गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को उस स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी जहाँ वह पुरुष या महिला निवास करता है। ऐसे मामलों में जहाँ ऐसा व्यक्ति पुलिस थाने उपस्थित होने के लिए तैयार है, उसे ऐसा करने की अनुमति दी जा सकती है।

viii. नए कानून में सभी अस्पतालों में महिलाओं और बच्चों के साथ अपराधों के पीड़ितों को निःशुल्क प्राथमिक उपचार या चिकित्सा उपचार प्रदान करने का प्रावधान है। यह प्रावधान चुनौतीपूर्ण समय में पीड़ितों की भलाई और स्वास्थ्य लाभ को प्राथमिकता देते हुए आवश्यक चिकित्सा देखभाल तक तत्काल पहुँच सुनिश्चित करता है।

 ix. किसी अपराध के लिए बच्चों को काम पर रखना, नियोजित करना या उन्हें अपराध में शामिल करना, भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 95 के तहत दंडनीय अपराध माना गया है। इसके लिए न्यूनतम सात वर्ष के कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसे दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। इस प्रावधान का उद्देश्य गिरोहों या समूहों को अपराध करने के लिए बच्चों को काम पर रखने/नियोजित करने से रोकना है।

C. प्रौद्योगिकी और फोरेंसिक के उपयोग से संबंधित प्रावधान

i. फोरेंसिक साक्ष्य संग्रहण और वीडियोग्राफी: मामले और जाँच को मज़बूत बनाने के लिए, फोरेंसिक विशेषज्ञों के लिए गंभीर अपराधों की जांच के लिए अपराध स्थलों का दौरा करना और 7 वर्ष या उससे अधिक की सज़ा वाले अपराधों में साक्ष्य एकत्र करना अनिवार्य कर दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, साक्ष्यों से छेड़छाड़ को रोकने के लिए अपराध स्थल पर साक्ष्य संग्रहण की प्रक्रिया की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी की जाएगी। यह दोहरा दृष्टिकोण जाँच की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाता है और न्याय के निष्पक्ष प्रशासन में योगदान देता है।

ii. इलेक्ट्रॉनिक समन: अब समन इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजे जा सकते हैं, जिससे कानूनी प्रक्रियाओं में तेज़ी आएगी, कागजी कार्रवाई कम होगी और सभी संबंधित पक्षों के बीच कुशल संचार सुनिश्चित होगा।

iii. सभी कार्यवाही इलेक्ट्रॉनिक मोड में: सभी कानूनी कार्यवाही इलेक्ट्रॉनिक रूप से संचालित करके, नए कानून पीड़ितों, गवाहों और अभियुक्तों को सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे पूरी कानूनी प्रक्रिया सुव्यवस्थित और त्वरित हो जाती है।

D. समय-सीमा

i.तेज़ और निष्पक्ष समाधान: नए कानून मामलों के तेज़ और निष्पक्ष समाधान का वादा करते हैं, जिससे कानूनी प्रणाली में विश्वास पैदा होता है।  जांच और परीक्षण के महत्वपूर्ण चरण जैसे - प्रारंभिक जांच (14 दिनों में पूरी की जानी है), आगे की जांच (90 दिनों में पूरी की जानी है), पीड़ित और आरोपी को दस्तावेज की आपूर्ति (14 दिनों के भीतर), मुकदमे के लिए मामले की प्रतिबद्धता (90 दिनों के भीतर), निर्वहन आवेदन दाखिल करना (60 दिनों के भीतर), आरोप तय करना (60 दिनों के भीतर), निर्णय की घोषणा (45 दिनों के भीतर) और दया याचिका दायर करना (राज्यपाल के समक्ष 30 दिन और राष्ट्रपति के समक्ष 60 दिन) - को सुव्यवस्थित किया गया है और निर्धारित समय अवधि के भीतर पूरा किया जाना है।

 ii. त्वरित जाँच: नए कानूनों ने महिलाओं और बच्चों के साथ अपराधों की जाँच को प्राथमिकता दी है, जिससे सूचना दर्ज होने के दो महीने के भीतर जाँच पूरी हो सके।

iii. स्थगन: अदालतें मामलों की सुनवाई में अनावश्यक देरी से बचने और समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए अधिकतम दो स्थगन दे सकती हैं।

E. सुधारात्मक दृष्टिकोण

i. सामुदायिक सेवा: नए कानूनों में छोटे अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा की व्यवस्था की गई है। अपराधियों को समाज में सकारात्मक योगदान देने, अपनी गलतियों से सीखने और मज़बूत सामुदायिक बंधन बनाने का अवसर मिलता है।

ii. संक्षिप्त सुनवाई के दायरे का विस्तार: अब संक्षिप्त सुनवाई के दायरे का विस्तार करके इसमें और अधिक अपराधों को शामिल किया गया है ताकि मामलों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित हो सके।

F. अभियुक्त के अधिकार

केवल न्यायिक कार्यवाही शुरू करने के लिए व्यक्तियों की मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई है। अब पुलिस को केवल मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस रिपोर्ट का संज्ञान लेने के लिए किसी आरोपी को गिरफ्तार करने की आवश्यकता नहीं है और हस्तलेख, हस्ताक्षर, फिंगरप्रिंट या आवाज के नमूने लेने के लिए किसी गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।

G. नए अपराध

i. आतंकवादी कृत्य, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य, मॉब लिंचिंग, छीना-झपटी, संगठित अपराध, छोटे-मोटे संगठित अपराध आदि से संबंधित नए अपराध जोड़े गए हैं।

ii. बार-बार चोरी का अपराध करने वालों के लिए कठोर दंड निर्धारित किया गया है - न्यूनतम 1 वर्ष की सजा अनिवार्य है जिसे जुर्माने के साथ 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। हालाँकि, छोटी-मोटी चोरी को प्रमुख अपराध बनने से रोकने के लिए, पहली बार अपराध करने वालों को केवल सामुदायिक सेवा की सजा दी जाती है, जहाँ चोरी की गई संपत्ति का मूल्य 5000 रुपये से कम है और या तो वह मूल्य वापस कर दिया जाता है, या वह संपत्ति वापस कर दी जाती है।

H. अनुपस्थिति में मुकदमा

उद्घोषित अपराधी घोषित व्यक्तियों के लिए अनुपस्थिति में मुकदमे का नया प्रावधान न्यायालय को अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने और फैसला सुनाने की अनुमति देता है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि न्याय में न तो देरी हो और न ही न्याय से इनकार किया जाए।

 गृह राज्य मंत्री श्री बंदी संजय कुमार ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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पीके/केसी/पीके/एसएस प्रविष्टि तिथि: 20 AUG 2025 by PIB Delhi(रिलीज़ आईडी: 2158608) आगंतुक पटल : 421

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पत्रकार और यूट्यूबर के बीच अंतर को समझना आसान है ! अगर हम उनके उद्देश्य, जिम्मेदारी और काम करने के तरीकों को देखें तो दोनों की मंशा और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है । 🎙️ पत्रकार   भूमिका: समाज को तथ्यात्मक, सत्यापित और संतुलित जानकारी देना।   जिम्मेदारी: पत्रकारिता आचार संहिता का पालन करना, स्रोतों की पुष्टि करना और निष्पक्ष रहना।   माध्यम: अख़बार, टीवी, रेडियो, पत्रिका, अन्य प्रिंट माध्यम    लक्ष्य: जनता को जागरूक करना, सत्ता और संस्थाओं को जवाबदेह बनाना।  विश्वसनीयता: गलत सूचना देने पर कानूनी और नैतिक जवाबदेही होती है।   📹 यूट्यूबर भूमिका: मनोरंजन, शिक्षा, व्यक्तिगत विचार या अनुभव साझा करना।   जिम्मेदारी: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की नीतियों का पालन करना, लेकिन ये शासकीय अपेक्षाओं के विपरीत पत्रकारिता जैसी सख़्त आचार संहिता का पालन नहीं करते है । सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते हैं ।  माध्यम: YouTube चैनल और सोशल मीडिया।   लक्ष्य: दर्शकों को एन-केन-प्रकारेंण आकर्षित करना, तथ्यविहीन लुभावनी जा...

अविभाजित भिलाई निगम के संपत्ति का लेखा-जोखा पारदर्शिता के दायरे में नहीं होने कर कारण भिलाई और रिसाली निगम को भारी नुकसान पहुंचाने वाले जमीन दलालों को फायदा हुआ है… वहीं दूसरी ओर आम-जनता जो अपनी जीवन भर के मेहनत की कमाई से महंगे भूखंड खरीद कर मकान बनाती है… उसे नगर पालिक निगम भिलाई और रिसाली के प्रशासन की अनियमितताओं के कारण ठगी का शिकार होने की चिंताजनक संभावना का सामान करना पड़ रहा था… इसलिए महापौरगण को अग्रलिखित बिंदुवार भूमि लेखा-जोखा संज्ञान नोटिस देकर प्रश्नांकित किया गया है..! पढ़िए पूरा मामला और नोटिस…

जन सामान्य के आवासीय प्रयोजन के भूखंडों का नियमितीकरण मामला नोटिस कार्यवाही प्रक्रिया से पारदर्शिता के दायरे में आयेगा… मौकापरस्त महापौर अब जन-सामान्य की समस्याओं को नजरंदाज करने की स्थिति में नहीं रहेंगे… अविभाजित भिलाई निगम में विगत कई वर्षों से लगातार कांग्रेस की शहर सरकार रहीं है… निगम महापौर भी कांग्रेस का रहा है… जिसने अविभाजित भिलाई निगम और विभाजित रिसाली एवं भिलाई निगम की संपत्ति का लेखा-जोखा पारदर्शिता के दायरे में लाने की पदेन जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया है जिसके कारण नोटिस देकर कार्यवाही करने की परिस्थिति बनी है… नोटिस Download लिंक 👇क्लिक करें 👇 https://drive.google.com/file/d/152ki3rd2ZzJRzu-pB_LDlrLpYwz9WqGR/view?usp=drivesdk पार्षद अब अपने प्राधिकार का उपयोग कर महापौर की पदेन जिम्मेदारी तय करवायेगें  जन सामान्य स्तर से की गई संज्ञान नोटिस पर अब पार्षद संज्ञान लेकर निगम महापौर से अपने वार्ड के शासकीय अचल संपत्ति ब्यौरा मांगने के बाध्य हो गए हैं क्योंकि… इस नोटिस की प्रति सभी पार्षदों को व्हाट्सएप पर दी गई है और पार्षद चाहें तो निगम आयुक्त से विधिवत इसकी छायाप्...

झोलाछाप डॉक्टरों और अपंजीकृत चिकित्सा व्यवसाइयों को पहचानना और उनसे बचाव करने के लिए हमारे लोकतांत्रिक कानूनी व्यवस्था में चिकित्सा सुविधा देने के नाम पर धोखाधड़ी करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने की है पर्याप्त व्यवस्था है… पढ़िए जागरूक रहने के विधिक पहलू…

लोक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाने वाले अनियमित चिकित्सा व्यवसाई ग्रामीण और शहरी दोनो ही जगह… अपनी दुकान चला रहें है लेकिन जन जागरूक के आभाव में इनके विरुद्ध शासन कानूनी कार्यवाही नहीं कर पा रहा है… इसलिए यह लेख जन जागरूकता लाने का एक प्रयास है… झोलाछाप डॉक्टरों को पहचानना और उनसे बचना बेहद ज़रूरी है। ये लोग न केवल आपके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं बल्कि आपकी जान को भी खतरे में डाल सकते हैं। झोलाछाप डॉक्टरों की कुछ खास पहचान: अयोग्यता का दावा: ये लोग अक्सर असाध्य बीमारियों का भी इलाज करने का दावा करते हैं, जो किसी योग्य डॉक्टर के लिए भी मुश्किल हो सकता है। गुप्त स्थान: ये लोग अक्सर घरों, छोटी दुकानों या ऐसी जगहों पर अपना क्लीनिक चलाते हैं जहां कोई मेडिकल सुविधाएं नहीं होतीं। सस्ते इलाज का लालच: ये लोग आमतौर पर अन्य डॉक्टरों की तुलना में बहुत कम पैसे में इलाज करने का झांसा देते हैं। आधुनिक तकनीक से अनभिज्ञता: ये लोग आधुनिक मेडिकल उपकरणों और तकनीकों से अनजान होते हैं। अनावश्यक दवाएं: ये लोग अक्सर मरीजों को अनावश्यक दवाएं देते हैं, जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती...

मामले जिन पर चर्चा गरमाई हुयी है

पत्रकार और यूट्यूबर में अंतर को सभी को जानना जरूरी है क्योंकि यूट्यूबर भ्रामक जानकारी के आधार पर स्वयं को पत्रकार होने का भ्रम बनाते है... परिणाम स्वरूप इसका विपरीत प्रभाव पत्रकारिता जगत पड़ रहा है...

पत्रकार और यूट्यूबर के बीच अंतर को समझना आसान है ! अगर हम उनके उद्देश्य, जिम्मेदारी और काम करने के तरीकों को देखें तो दोनों की मंशा और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है । 🎙️ पत्रकार   भूमिका: समाज को तथ्यात्मक, सत्यापित और संतुलित जानकारी देना।   जिम्मेदारी: पत्रकारिता आचार संहिता का पालन करना, स्रोतों की पुष्टि करना और निष्पक्ष रहना।   माध्यम: अख़बार, टीवी, रेडियो, पत्रिका, अन्य प्रिंट माध्यम    लक्ष्य: जनता को जागरूक करना, सत्ता और संस्थाओं को जवाबदेह बनाना।  विश्वसनीयता: गलत सूचना देने पर कानूनी और नैतिक जवाबदेही होती है।   📹 यूट्यूबर भूमिका: मनोरंजन, शिक्षा, व्यक्तिगत विचार या अनुभव साझा करना।   जिम्मेदारी: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की नीतियों का पालन करना, लेकिन ये शासकीय अपेक्षाओं के विपरीत पत्रकारिता जैसी सख़्त आचार संहिता का पालन नहीं करते है । सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते हैं ।  माध्यम: YouTube चैनल और सोशल मीडिया।   लक्ष्य: दर्शकों को एन-केन-प्रकारेंण आकर्षित करना, तथ्यविहीन लुभावनी जा...

झोलाछाप डॉक्टरों और अपंजीकृत चिकित्सा व्यवसाइयों को पहचानना और उनसे बचाव करने के लिए हमारे लोकतांत्रिक कानूनी व्यवस्था में चिकित्सा सुविधा देने के नाम पर धोखाधड़ी करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने की है पर्याप्त व्यवस्था है… पढ़िए जागरूक रहने के विधिक पहलू…

लोक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाने वाले अनियमित चिकित्सा व्यवसाई ग्रामीण और शहरी दोनो ही जगह… अपनी दुकान चला रहें है लेकिन जन जागरूक के आभाव में इनके विरुद्ध शासन कानूनी कार्यवाही नहीं कर पा रहा है… इसलिए यह लेख जन जागरूकता लाने का एक प्रयास है… झोलाछाप डॉक्टरों को पहचानना और उनसे बचना बेहद ज़रूरी है। ये लोग न केवल आपके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं बल्कि आपकी जान को भी खतरे में डाल सकते हैं। झोलाछाप डॉक्टरों की कुछ खास पहचान: अयोग्यता का दावा: ये लोग अक्सर असाध्य बीमारियों का भी इलाज करने का दावा करते हैं, जो किसी योग्य डॉक्टर के लिए भी मुश्किल हो सकता है। गुप्त स्थान: ये लोग अक्सर घरों, छोटी दुकानों या ऐसी जगहों पर अपना क्लीनिक चलाते हैं जहां कोई मेडिकल सुविधाएं नहीं होतीं। सस्ते इलाज का लालच: ये लोग आमतौर पर अन्य डॉक्टरों की तुलना में बहुत कम पैसे में इलाज करने का झांसा देते हैं। आधुनिक तकनीक से अनभिज्ञता: ये लोग आधुनिक मेडिकल उपकरणों और तकनीकों से अनजान होते हैं। अनावश्यक दवाएं: ये लोग अक्सर मरीजों को अनावश्यक दवाएं देते हैं, जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती...

निगम अधिनियम में वार्ड पार्षद को कई महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए है... जिनका प्रयोग करके वार्ड पार्षद अपने निर्वाचन क्षेत्र का सर्वागीण विकास कर सकता है... इसके लिए आवश्यक है की पार्षद को निगम अधिनियम के अग्रलिखित विधि निर्देश को पढ़ना और समझना पड़ेगा तथा अपने अधिकार को प्रयोग में लाना होगा

पार्षदों को मिला असीमित अधिकार अब पार्षद प्रश्न भी पूछ सकेंगे,   प्रश्न से सम्बंधित दस्तावेजो और फ़ाइल का अवलोकन भी कर सकेंगे और   नियम आयुक्त और निगम अधिकारियो से निगम सम्मिलन के दिन लिखित में जवाब भी प्राप्त कर सकेंगे इसलिए अब निगम आयुक्त, निगम के अधिकारी / कर्मचारी और जिम्मेदार जन प्रतिनिधि अर्थात एम.आई.सी. सदस्य इन तीनो से पार्षद सीधे प्रश्न पूछकर जवाब मांग सकेंगे तथा विधायक और सांसद की तरह शहर सरकार का सशक्त अंग होने की अपनी पहचान बना सकेंगे पार्षद को शक्ति संपन्न बनाने वाले निगम अधिनियम के अंतर्गत बनाये गए नियम निम्नानुसार हैं :-  पहला नियम :-   छ.ग. नगर पालिक निगम अधिनियम १९५६ की धारा २५-क पार्षदों के कर्तव्य - छ.ग. नगर पालिक निगम अधिनियम १९५६ की धारा २५-क में परिभाषित किये गए है और इस विधि निर्देश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि, पार्षद निगम सम्मिलन में भाग लेकर महापौर या आयुक्त का ध्यान... निगम की सम्पत्ति की किसी हानी या... निगम के किसी योजना या.... सेवा में किसी कमी के तरफ ध्यानान्कर्षण करवायेगा दूसरा नियम :- छ,ग. नगरपालिक (कामकाज के ...

यूट्यूबर यशवंत साहू जो… भिलाई टाईम्स नामक ब्लॉग लिखता है और… यह कपटपूर्ण विषयवस्तु वाले वीडियो आधारित दबदबा बनाकर सोशल मीडिया मंच वाला व्यापार चलाता है… इसी व्यापारिक गतिविधि के तहत यशवंत के द्वारा आपत्तिजनक वीडियो रोजाना बनाया जाता है… इस आपराधिक गतिविधि की पुनरावृत्ति करते हुए यशवंत ने… विगत दिनों उचित मूल्य दुकान का संचालन करने वाली… महिला स्व सहायता समूहों पर मानसिक दबाव बनाने का कपट पूर्वक प्रयास किया है… जिसकी पुलिस FIR कार्यवाही शिकायत दर्ज करवाई गई है..! पढ़िए पूरा मामला…

भिलाई टाईम्स वाला यूट्यूबर यशवंत साहू पुलिस शिकायत का सामना करेगा रिसाली और भिलाई के कुछ वार्डों की जानकारी और… लोगों की आपसी खुन्नस को… चटकेदार मिर्च मसाला लगाकर… बिना किसी दस्तावेजिक प्रमाण के… यशवंत बयानबाजी करते हुए नाटकीय वीडियो बनाता है और… वीडियो को अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर… यशवंत प्रकाशित करता है । जिस पर आने वाली लाईक और क्लीक बढ़ाकर यशवंत द्वारा… अपनी रोजी रोटी चलाय जाना की बात लोगों ने बताई है लेकिन… इस बार यशवंत ने अपनी यूट्यूबर सीमा से बाहर जाकर… उचित मूल्य दुकान की संचालक महिला स्व सहायता समूहों को निशाना बनाया और… अपने बड़बोले अंदाज में पुलिस और शासन को भी… अपनी युटुब वीडियो बयान विषयवस्तु के आधार पर कटघरे में खड़ा कर दिया है । इसलिए अब यूट्यूबर यशवंत साहू पुलिस शिकायत कार्यवाही का सामना करने की स्थिति में आ गया है । जवाबदेही तय : बचकाना भाषा शैली और लालच ने यशवंत को बुरा फसाया… साबित करना पड़ेगा फिल्मी डायलॉग वाले आरोप..!  वैसे तो यूट्यूबर यशवंत स्थानीय राजनीति में अपनी छोटी मोटी जगह तलाशने और… भ्रामक जानकारी के आधार पर बनाए नाटकीय वीडियो के आधार पर ...

दुर्ग से कांग्रेस संगठन की केंद्रीय कार्यकारिणी की नजरों में अग्रणी स्थान बनाने वाले मोतीलाल वोरा जी के बाद… अपने दम पर उल्लेखनीय राजनीतिक भूमिका हासिल करने वाली… कांग्रेस पार्टी के लिए समर्पित सामाजिक कार्यकर्त एनी पीटर ही है… जो कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ़ की जमीनी कार्यकर्ता है… जिसने दिल्ली की कर्मभूमि पर… कांग्रेस के लिए मोर्चा संभाला..! और दुर्ग का नाम अपने दम पर केंद्रीय राजनीति में दर्ज करवा दिया है… पढ़िए एक विश्लेषण..!

माननीय वोरा जी के बाद… वैसे छत्तीसगढ़ का दुर्ग जिला… केंद्रीय राजनीति में दो जन नेता के नामों के लिए जाना जाता है पहला मोतीलाल वोरा Moti lal Vora और दूसरा सरोज पांडेय..! Saroj Pandey उल्लेखनीय है कि ये दोनों जन नेता अपने दम पर अपनी पार्टी के केंद्रीय पदाधिकारियों से संपर्क में आए और इन्होंने अपना अद्वितीय स्थान अपनी - अपनी पार्टी में बनाया लेकिन… अब इस कड़ी में सामाजिक कार्यकर्ता एनी पीटर का नाम भी जुड़ता जा रहा है… वैसे यह नव-उज्वलित नाम..! अभी सिर्फ सड़क की लड़ाई के पहले पायदान पर है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली की सड़कों पर अपनी संघर्षरत गाथा के आधार पर अपनी उपस्थिति देकर  सुर्खियां बटोर रहा है..! एकल चलो रे..! Chhattisgadh congress  सामाजिक कार्यकर्ता एनी पीटर समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ता है इसके कई उदाहरण है जो कांग्रेसी आह्वाहन पर सड़क पर संघर्ष करने वाली कार्यकता होने के तौर पर पहचानी जाती है… वैसे तो छत्तीसगढ़ कांग्रेस कई खेमों और गुटों में बटी है लेकिन एनी पीटर ही एक मात्र समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ता है जो सभी के साथ तालमेल रखती है और जब भी कांग्रेस पार्टी को जरूरत प...

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