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नए आपराधिक कानूनों की मुख्य विशेषताएँ


नए आपराधिक कानूनों में शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने वाले प्रावधान शामिल किए गए हैं। इन कानूनों की मुख्य विशेषताएँ अनुलग्नक में दी गई हैं।

जेलों में भीड़भाड़ कम करने के लिए, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) में निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं:

i. बीएनएसएस की धारा 290 में, आरोपी का अभियोजक के साथ समझौता करना (प्ली बार्गेनिंग) समयबद्ध बनाया गया है और प्ली बार्गेनिंग के लिए आवेदन आरोप तय होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर किया जा सकता है।  बीएनएस की धारा 293 के अंतर्गत मामले का पारस्परिक रूप से संतोषजनक निपटारा करने के लिए, जहाँ अभियुक्त ने पहली बार अपराध किया है और उसे पहले कभी किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराया गया है, न्यायालय ऐसे अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिए निर्धारित दंड का एक-चौथाई/छठा भाग दंड दे सकता है।

ii. बीएनएसएस की धारा 479 में विचाराधीन कैदी को हिरासत में रखने की अधिकतम अवधि निर्धारित की गई है। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि जहाँ कोई व्यक्ति पहली बार अपराध करता है (जिसे पहले कभी किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराया गया है), उसे न्यायालय द्वारा मुचलके पर रिहा किया जाएगा, यदि उसे कानून के तहत ऐसे अपराध के लिए निर्दिष्ट कारावास की अधिकतम अवधि की एक-तिहाई अवधि तक हिरासत में रखा गया है। इसके अतिरिक्त, इस संबंध में न्यायालय में आवेदन करना जेल अधीक्षक का कर्तव्य होगा।

iii. पहली बार, सामुदायिक सेवा को दंडों में से एक के रूप में पेश किया गया है।

नए आपराधिक कानूनों की मुख्य विशेषताएँ

नए आपराधिक कानून नागरिक-केंद्रित, अधिक सुलभ और कुशल न्याय प्रणाली बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। नए आपराधिक कानूनों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

A. पीड़ित-केंद्रित प्रावधान

i. घटनाओं की ऑनलाइन रिपोर्ट: अब कोई व्यक्ति पुलिस थाने जाए बिना, इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से घटनाओं की रिपोर्ट कर सकता है। इससे रिपोर्टिंग आसान और त्वरित हो जाती है, जिससे पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई संभव हो जाती है।

 ii. किसी भी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करें: ज़ीरो एफआईआर की शुरुआत के साथ, कोई भी व्यक्ति किसी भी पुलिस थाने में, चाहे उसका क्षेत्राधिकार कुछ भी हो, प्राथमिकी दर्ज करा सकता है। इससे कानूनी कार्यवाही शुरू करने में होने वाली देरी समाप्त हो जाती है और अपराध की तत्काल रिपोर्ट सुनिश्चित होती है।

iii. एफआईआर की निःशुल्क प्रति: पीड़ित को एफआईआर की निःशुल्क प्रति प्राप्त करने का अधिकार है, जिससे कानूनी प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित होती है।

iv. गिरफ्तारी पर सूचना देने का अधिकार: गिरफ्तारी की स्थिति में, व्यक्ति को अपनी स्थिति के बारे में अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को सूचित करने का अधिकार है। इससे गिरफ्तार व्यक्ति को तत्काल सहायता और सहयोग सुनिश्चित होगा।

v. गिरफ्तारी की जानकारी प्रदर्शित करना: अब प्रत्येक पुलिस थाने और जिले में एक नामित पुलिस अधिकारी होना अनिवार्य है, जो एएसआई के पद से नीचे का न हो और सभी गिरफ्तार व्यक्तियों की जानकारी अब प्रत्येक थाने में प्रमुखता से प्रदर्शित की जाएगी। इससे अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा होती है और पुलिस द्वारा हिरासत में हिंसा और अवैध हिरासत की घटनाओं में कमी आती है।

vi. पीड़ितों को प्रगति संबंधी अद्यतन सूचना: पीड़ितों को 90 दिनों के भीतर अपने मामले की प्रगति की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। यह प्रावधान पीड़ितों को कानूनी प्रक्रिया से अवगत और संबद्ध रखता है, जिससे पारदर्शिता और विश्वास बढ़ता है।

vii. पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज़ों की आपूर्ति: अभियुक्त और पीड़ित दोनों को 14 दिनों के भीतर प्राथमिकी, पुलिस रिपोर्ट/आरोपपत्र, बयान, स्वीकारोक्ति और अन्य दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने का अधिकार है।

viii. गवाह संरक्षण योजना: नए कानून सभी राज्य सरकारों को गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कानूनी कार्यवाही की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए गवाह संरक्षण योजना लागू करने का निर्देश देते हैं।

ix. पुलिस थाने जाने से छूट: महिलाओं, 15 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों, 60 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों और दिव्यागजन या गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को पुलिस थाने जाने से छूट दी गई है।

x. बीएनएसएस की धारा 360 में अभियोजन से हटने से पहले पीड़ित की सुनवाई अनिवार्य है। पीड़ित के सुनवाई के अधिकार को वैधानिक मान्यता आपराधिक न्याय प्रणाली के न्याय-केंद्रित दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।  मामलों की वापसी से संबंधित कार्यवाही में पीड़ित की अनिवार्य सुनवाई से न्याय प्रणाली अपराध से सीधे प्रभावित लोगों की आवश्यकताओं और चिंताओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है।

 B. महिला एवं बाल संरक्षण के प्रावधान

i. बीएनएस के नए अध्याय-V में महिलाओं और बच्चों के साथ अपराधों को अन्य सभी अपराधों पर वरीयता दी गई है।

ii. बीएनएस में, सामूहिक बलात्कार की नाबालिग पीड़ितों के लिए आयु का अंतर समाप्त कर दिया गया है। पहले 16 वर्ष और 12 वर्ष से कम आयु की लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए अलग-अलग दंड निर्धारित थे। इस प्रावधान को संशोधित किया गया है और अब अठारह वर्ष से कम आयु की लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है।

iii. महिलाओं को परिवार के एक वयस्क सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है जो सम्मन किए गए व्यक्ति की ओर से सम्मन प्राप्त कर सकती हैं। पहले के 'किसी वयस्क पुरुष सदस्य' के संदर्भ को 'किसी वयस्क सदस्य' से बदल दिया गया है।

iv. पीड़िता को अधिक सुरक्षा प्रदान करने और बलात्कार के अपराध से संबंधित जाँच में पारदर्शिता लागू करने के लिए, पुलिस पीड़िता का बयान ऑडियो-वीडियो माध्यम से दर्ज करेगी।

v. महिलाओं के साथ कुछ अपराधों के लिए, जहाँ तक संभव हो, पीड़िता का बयान महिला मजिस्ट्रेट द्वारा और उसकी अनुपस्थिति में पुरुष मजिस्ट्रेट द्वारा महिला की उपस्थिति में दर्ज किया जाना चाहिए ताकि संवेदनशीलता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके और पीड़ितों के लिए सहायक वातावरण तैयार किया जा सके।

vi. चिकित्सकों को बलात्कार पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट 7 दिनों के भीतर जाँच अधिकारी को भेजना अनिवार्य है।

vii. यह प्रावधान किया गया है कि पंद्रह वर्ष से कम आयु के या 60 वर्ष (65 वर्ष से पहले) से अधिक आयु के किसी भी पुरुष व्यक्ति, महिला, मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यागजन या गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को उस स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी जहाँ वह पुरुष या महिला निवास करता है। ऐसे मामलों में जहाँ ऐसा व्यक्ति पुलिस थाने उपस्थित होने के लिए तैयार है, उसे ऐसा करने की अनुमति दी जा सकती है।

viii. नए कानून में सभी अस्पतालों में महिलाओं और बच्चों के साथ अपराधों के पीड़ितों को निःशुल्क प्राथमिक उपचार या चिकित्सा उपचार प्रदान करने का प्रावधान है। यह प्रावधान चुनौतीपूर्ण समय में पीड़ितों की भलाई और स्वास्थ्य लाभ को प्राथमिकता देते हुए आवश्यक चिकित्सा देखभाल तक तत्काल पहुँच सुनिश्चित करता है।

 ix. किसी अपराध के लिए बच्चों को काम पर रखना, नियोजित करना या उन्हें अपराध में शामिल करना, भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 95 के तहत दंडनीय अपराध माना गया है। इसके लिए न्यूनतम सात वर्ष के कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसे दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। इस प्रावधान का उद्देश्य गिरोहों या समूहों को अपराध करने के लिए बच्चों को काम पर रखने/नियोजित करने से रोकना है।

C. प्रौद्योगिकी और फोरेंसिक के उपयोग से संबंधित प्रावधान

i. फोरेंसिक साक्ष्य संग्रहण और वीडियोग्राफी: मामले और जाँच को मज़बूत बनाने के लिए, फोरेंसिक विशेषज्ञों के लिए गंभीर अपराधों की जांच के लिए अपराध स्थलों का दौरा करना और 7 वर्ष या उससे अधिक की सज़ा वाले अपराधों में साक्ष्य एकत्र करना अनिवार्य कर दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, साक्ष्यों से छेड़छाड़ को रोकने के लिए अपराध स्थल पर साक्ष्य संग्रहण की प्रक्रिया की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी की जाएगी। यह दोहरा दृष्टिकोण जाँच की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाता है और न्याय के निष्पक्ष प्रशासन में योगदान देता है।

ii. इलेक्ट्रॉनिक समन: अब समन इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजे जा सकते हैं, जिससे कानूनी प्रक्रियाओं में तेज़ी आएगी, कागजी कार्रवाई कम होगी और सभी संबंधित पक्षों के बीच कुशल संचार सुनिश्चित होगा।

iii. सभी कार्यवाही इलेक्ट्रॉनिक मोड में: सभी कानूनी कार्यवाही इलेक्ट्रॉनिक रूप से संचालित करके, नए कानून पीड़ितों, गवाहों और अभियुक्तों को सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे पूरी कानूनी प्रक्रिया सुव्यवस्थित और त्वरित हो जाती है।

D. समय-सीमा

i.तेज़ और निष्पक्ष समाधान: नए कानून मामलों के तेज़ और निष्पक्ष समाधान का वादा करते हैं, जिससे कानूनी प्रणाली में विश्वास पैदा होता है।  जांच और परीक्षण के महत्वपूर्ण चरण जैसे - प्रारंभिक जांच (14 दिनों में पूरी की जानी है), आगे की जांच (90 दिनों में पूरी की जानी है), पीड़ित और आरोपी को दस्तावेज की आपूर्ति (14 दिनों के भीतर), मुकदमे के लिए मामले की प्रतिबद्धता (90 दिनों के भीतर), निर्वहन आवेदन दाखिल करना (60 दिनों के भीतर), आरोप तय करना (60 दिनों के भीतर), निर्णय की घोषणा (45 दिनों के भीतर) और दया याचिका दायर करना (राज्यपाल के समक्ष 30 दिन और राष्ट्रपति के समक्ष 60 दिन) - को सुव्यवस्थित किया गया है और निर्धारित समय अवधि के भीतर पूरा किया जाना है।

 ii. त्वरित जाँच: नए कानूनों ने महिलाओं और बच्चों के साथ अपराधों की जाँच को प्राथमिकता दी है, जिससे सूचना दर्ज होने के दो महीने के भीतर जाँच पूरी हो सके।

iii. स्थगन: अदालतें मामलों की सुनवाई में अनावश्यक देरी से बचने और समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए अधिकतम दो स्थगन दे सकती हैं।

E. सुधारात्मक दृष्टिकोण

i. सामुदायिक सेवा: नए कानूनों में छोटे अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा की व्यवस्था की गई है। अपराधियों को समाज में सकारात्मक योगदान देने, अपनी गलतियों से सीखने और मज़बूत सामुदायिक बंधन बनाने का अवसर मिलता है।

ii. संक्षिप्त सुनवाई के दायरे का विस्तार: अब संक्षिप्त सुनवाई के दायरे का विस्तार करके इसमें और अधिक अपराधों को शामिल किया गया है ताकि मामलों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित हो सके।

F. अभियुक्त के अधिकार

केवल न्यायिक कार्यवाही शुरू करने के लिए व्यक्तियों की मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई है। अब पुलिस को केवल मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस रिपोर्ट का संज्ञान लेने के लिए किसी आरोपी को गिरफ्तार करने की आवश्यकता नहीं है और हस्तलेख, हस्ताक्षर, फिंगरप्रिंट या आवाज के नमूने लेने के लिए किसी गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।

G. नए अपराध

i. आतंकवादी कृत्य, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य, मॉब लिंचिंग, छीना-झपटी, संगठित अपराध, छोटे-मोटे संगठित अपराध आदि से संबंधित नए अपराध जोड़े गए हैं।

ii. बार-बार चोरी का अपराध करने वालों के लिए कठोर दंड निर्धारित किया गया है - न्यूनतम 1 वर्ष की सजा अनिवार्य है जिसे जुर्माने के साथ 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। हालाँकि, छोटी-मोटी चोरी को प्रमुख अपराध बनने से रोकने के लिए, पहली बार अपराध करने वालों को केवल सामुदायिक सेवा की सजा दी जाती है, जहाँ चोरी की गई संपत्ति का मूल्य 5000 रुपये से कम है और या तो वह मूल्य वापस कर दिया जाता है, या वह संपत्ति वापस कर दी जाती है।

H. अनुपस्थिति में मुकदमा

उद्घोषित अपराधी घोषित व्यक्तियों के लिए अनुपस्थिति में मुकदमे का नया प्रावधान न्यायालय को अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने और फैसला सुनाने की अनुमति देता है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि न्याय में न तो देरी हो और न ही न्याय से इनकार किया जाए।

 गृह राज्य मंत्री श्री बंदी संजय कुमार ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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पीके/केसी/पीके/एसएस प्रविष्टि तिथि: 20 AUG 2025 by PIB Delhi(रिलीज़ आईडी: 2158608) आगंतुक पटल : 421

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फर्जी प्रमाण पत्र  नियम विरुद्ध हासिल किए गए फर्जी शैक्षणिक आहर्ताएँ शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करती हैं, समाज में विश्वास की कमी पैदा करती हैं और अयोग्य व्यक्तियों को जिम्मेदार पदों पर बैठाकर भविष्य की पीढ़ियों को नुकसान पहुँचाती हैं।   फर्जी शैक्षणिक आहर्ता से समाज पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव और नुकसान… 1. शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है चिंताजनक विपरीत असर गुणवत्ता में गिरावट: जब शिक्षक या पेशेवर फर्जी डिग्री लेकर नौकरी करते हैं, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।   शिक्षण प्रणाली की विश्वसनीयता कम होती है: असली मेहनत करने वाले छात्रों और योग्य व्यक्तियों का विश्वास टूटता है।   संस्थागत भ्रष्टाचार निरंकुश होकर पनपता है: फर्जी प्रमाणपत्रों का चलन शिक्षा संस्थानों की साख को नुकसान पहुँचाता है।   2. सामाजिक ढाँचे को पहुंचता है अपूरणीय नुकसान और डालता है विपरीत असर नैतिक पतन: समाज में शैक्षणिक स्तर से ईमानदारी और मेहनत की जगह धोखाधड़ी को बढ़ावा मिलता है।   असमानता और अन्याय: योग्य उम्मीदवारों को अवसर नहीं मिलते, जिससे सामाजिक असमानता ...

निर्माण श्रमिकों के सर्वांगीण उत्थान के लिए शासन योजनाओं का संचालन कर रहीं जिनकी जानकारी हितग्राही श्रमिक तक पहुंचना आवश्यक है... इसलिए इनको जान लीजिए...

  निर्माण श्रमिक अर्थात कौन ? निर्माण श्रमिक से तात्पर्य जो किसी भवन या निर्माण कार्य में कुशल, अर्द्ध कुशल या अकुशल श्रमिक के रूप में शारीरिक, पर्यवेक्षणिक, तकनीकी अथवा लिपिकीय कार्य भाड़े या पारिश्रमिक के लिए करता हो। नियोजन के निबन्धन प्रकट हों या विवक्षित हो, किन्तु प्रबंधकीय या प्रशासकीय हैसियत में नियोजित व्यक्ति इसमें सम्मिलित नहीं है। कहां होता पंजीयन ? हितग्राही पंजीयन भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार अधिनियम, 1996 के अंतर्गत प्रत्येक निर्माण श्रमिक का पंजीयन मंडल के द्वारा किया जाता है। पंजीयन हेतु अर्हताएं क्या है ? निर्माण श्रमिक के रूप में पंजीयन हेतु निर्धारित आयु सीमा 18 वर्ष से कम नहीं किन्तु 60 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। उल्लेखनीय हैे कि, हितग्राही श्रमिक द्वारा विगत एक वर्ष में भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिक के रूप में 90 दिवस कार्य करने संबंधी नियोजक / श्रमिक संघ / श्रम निरीक्षक द्वारा जारी प्रमाण पत्र अपलोड किया जाना अनिवार्य है। कहां होता हैं पंजीयन ? किसी भी लोक सेवा केन्द्र से श्रम विभाग के वेबसाईट पर ऑन-लाईन आवेदन कर सकते हैं। वेबसाईट लिंक अंत में दी गई जिस...

पत्रकार और यूट्यूबर में अंतर को सभी को जानना जरूरी है क्योंकि यूट्यूबर भ्रामक जानकारी के आधार पर स्वयं को पत्रकार होने का भ्रम बनाते है... परिणाम स्वरूप इसका विपरीत प्रभाव पत्रकारिता जगत पड़ रहा है...

पत्रकार और यूट्यूबर के बीच अंतर को समझना आसान है ! अगर हम उनके उद्देश्य, जिम्मेदारी और काम करने के तरीकों को देखें तो दोनों की मंशा और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है । 🎙️ पत्रकार   भूमिका: समाज को तथ्यात्मक, सत्यापित और संतुलित जानकारी देना।   जिम्मेदारी: पत्रकारिता आचार संहिता का पालन करना, स्रोतों की पुष्टि करना और निष्पक्ष रहना।   माध्यम: अख़बार, टीवी, रेडियो, पत्रिका, अन्य प्रिंट माध्यम    लक्ष्य: जनता को जागरूक करना, सत्ता और संस्थाओं को जवाबदेह बनाना।  विश्वसनीयता: गलत सूचना देने पर कानूनी और नैतिक जवाबदेही होती है।   📹 यूट्यूबर भूमिका: मनोरंजन, शिक्षा, व्यक्तिगत विचार या अनुभव साझा करना।   जिम्मेदारी: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की नीतियों का पालन करना, लेकिन ये शासकीय अपेक्षाओं के विपरीत पत्रकारिता जैसी सख़्त आचार संहिता का पालन नहीं करते है । सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते हैं ।  माध्यम: YouTube चैनल और सोशल मीडिया।   लक्ष्य: दर्शकों को एन-केन-प्रकारेंण आकर्षित करना, तथ्यविहीन लुभावनी जा...

मामले जिन पर चर्चा गरमाई हुयी है

छत्तीसगढ़ में उचित मूल्य दुकानों का संचालन करने वाली स्व सहायता समूहों के साथ खाद्य विभाग के अधिकारियों द्वारा कि जा रही है प्रशासकीय धोखाधड़ी जानिए कैसे…?

महिला समूहों को... उनके दुकान के प्रतिमाह का... वित्तीय विवरण खाद्य विभाग देता है क्या ? गड़बड़ियों के पिटारे में से… छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत संचालित शासकीय उचित मूल्य दुकानों (राशन दुकानों) में खाद्य विभाग के कुछ अधिकारियों/ कर्मचारियों और स्व-सहायता समूहों (SHGs) के बीच समन्वय और गड़बड़ी के कई मामले सामने आते रहे हैं। इस विषय को दोनों पक्षों के पहलुओं से समझा जाना आवश्यक है। तभी सार्थक हल निकलना संभव होगा । एक तरफ जहां कुछ समूहों द्वारा वाकई अनियमितता किए जाने की बात सामने आती है, तो वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं और समूहों के शोषण व प्रशासनिक दबाव की शिकायतें भी उठती रही हैं। जिसका असल कारण यह है कि, महिला समूहों को प्रतिमाह लेन देन का वित्तीय विवरण खाद्य नियंत्रक कार्यालय से उपलब्ध नहीं कराया जाता है और ऐसे मासिक विवरण की जानकारी सार्वजनिक करने की जिम्मेदारी खाद्य विभाग पूरी नहीं कर रहा है । इस गंभीर विषय ओर खाद्य नियंत्रक प्रश्नांकित है । छत्तीसगढ़ के जमीनी परिदृश्य और इस पूरे विषय के मुख्य बिंदु बेहद चिंताजनक हैं गड़बड़ियां कई स्तरो...

यूट्यूबर यशवंत साहू जो… भिलाई टाईम्स नामक ब्लॉग लिखता है और… यह कपटपूर्ण विषयवस्तु वाले वीडियो आधारित दबदबा बनाकर सोशल मीडिया मंच वाला व्यापार चलाता है… इसी व्यापारिक गतिविधि के तहत यशवंत के द्वारा आपत्तिजनक वीडियो रोजाना बनाया जाता है… इस आपराधिक गतिविधि की पुनरावृत्ति करते हुए यशवंत ने… विगत दिनों उचित मूल्य दुकान का संचालन करने वाली… महिला स्व सहायता समूहों पर मानसिक दबाव बनाने का कपट पूर्वक प्रयास किया है… जिसकी पुलिस FIR कार्यवाही शिकायत दर्ज करवाई गई है..! पढ़िए पूरा मामला…

भिलाई टाईम्स वाला यूट्यूबर यशवंत साहू पुलिस शिकायत का सामना करेगा रिसाली और भिलाई के कुछ वार्डों की जानकारी और… लोगों की आपसी खुन्नस को… चटकेदार मिर्च मसाला लगाकर… बिना किसी दस्तावेजिक प्रमाण के… यशवंत बयानबाजी करते हुए नाटकीय वीडियो बनाता है और… वीडियो को अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर… यशवंत प्रकाशित करता है । जिस पर आने वाली लाईक और क्लीक बढ़ाकर यशवंत द्वारा… अपनी रोजी रोटी चलाय जाना की बात लोगों ने बताई है लेकिन… इस बार यशवंत ने अपनी यूट्यूबर सीमा से बाहर जाकर… उचित मूल्य दुकान की संचालक महिला स्व सहायता समूहों को निशाना बनाया और… अपने बड़बोले अंदाज में पुलिस और शासन को भी… अपनी युटुब वीडियो बयान विषयवस्तु के आधार पर कटघरे में खड़ा कर दिया है । इसलिए अब यूट्यूबर यशवंत साहू पुलिस शिकायत कार्यवाही का सामना करने की स्थिति में आ गया है । जवाबदेही तय : बचकाना भाषा शैली और लालच ने यशवंत को बुरा फसाया… साबित करना पड़ेगा फिल्मी डायलॉग वाले आरोप..!  वैसे तो यूट्यूबर यशवंत स्थानीय राजनीति में अपनी छोटी मोटी जगह तलाशने और… भ्रामक जानकारी के आधार पर बनाए नाटकीय वीडियो के आधार पर ...

योजना - अनुसूचित जाति कल्याण योजनाओं के कार्यान्वयन को डिजिटाइज़ करने और मजबूत बनाने के लिए पीएम-अजय पोर्टल और अजय मोबाइल ऐप का शुभारंभ

केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने अनुसूचित जाति कल्याण योजनाओं के कार्यान्वयन को डिजिटाइज़ करने और मजबूत बनाने के लिए पीएम-अजय पोर्टल और अजय मोबाइल ऐप का शुभारंभ किया पीएम-अजय पोर्टल के माध्‍यम से आदर्श ग्राम , जीआईए और छात्रावास के लिए वास्तविक समय की निगरानी , पारदर्शी शासन और निधि प्रवाह सक्षम हो सकेगा   केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने प्रधानमंत्री अनुसूचित जाति अभ्युदय योजना (पीएम-अजय) के त्वरित और गुणवत्तापूर्ण कार्यान्वयन के लिए ' पीएम-अजय ' पोर्टल और पीएम-अजय मोबाइल ऐप का शुभारंभ किया। इस योजना का उद्देश्य कागज आधारित कार्य प्रणाली और प्रसंस्करण से पूर्णतः डिजिटल कार्य प्रणाली और वास्तविक समय के आधार पर प्रसंस्करण में परिवर्तन करना है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने राज्य मंत्री श्री बी.एल. वर्मा , सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव श्री सुधांश पंत और सरकार के सामाजिक न्याय विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में पीएम-अजय पोर्टल और अजय मोबाइल ऐप का शुभारंभ किया। सभी राज्यों और केंद्र शा...

कोव्हीशील्ड लसीच्या पहिल्या आणि दुसऱ्या मात्रेमधील अंतर 12 ते 16 आठवड्यांपर्यंत वाढविण्याची कोविड कार्यकारी गटाची ही शिफारस मान्य केली आहे.

कोविड कार्यकारी गटाच्या सल्ल्यानुसार कोव्हीशील्ड लसीच्या दोन मात्रांमधील अंतर 6-8 आठवड्यांपासून 12-16 आठवड्यांपर्यंत वाढविण्यात आले Release Ministry of Health and Family Welfare कोविड कार्यकारी गटाच्या सल्ल्यानुसार कोव्हीशील्ड लसीच्या दोन मात्रांमधील अंतर 6-8 आठवड्यांपासून 12-16 आठवड्यांपर्यंत वाढविण्यात आले Posted Date:- May 13, 2021 नवी दिल्ली, 13 मे 2021 डॉ. एन. के. अरोरा यांच्या अध्यक्षतेखालील कोविड कार्यकारी गटाने, कोव्हीशील्ड लसीच्या पहिल्या आणि दुसऱ्या मात्रेमधील अंतर 12 ते 16 आठवड्यांपर्यंत वाढवण्याची शिफारस केली आहे. कोव्हीशिलड लसीच्या दोन मात्रांमधील विद्यमान अंतर 6-8 आठवडे आहे. विशेषतः ब्रिटनमधील उपलब्ध वास्तववादी पुराव्यांच्या आधारे, कोविड -19 कार्यकारी गटाने कोव्हीशिल्ड लसीच्या दोन मात्रांमधील अंतर 12-16 आठवड्यांपर्यंत वाढवण्यासाठी सहमती दर्शविली. कोविड कार्यकारी गटात खालील सदस्यांचा समावेश आहे: 1 . डॉ एन के अरोरा,संचालक ,आयएनसीएलएएन ट्रस्ट 2 . डॉ. राकेश अग्रवाल , संचालक आणि अधिष्ठाता , जीआयपीएमईआर, पुडुचेरी 3. डॉ. गगनदीप कांग, प्राध्यापक, ख्रिश्चन वैद्यकी...

खाद्य विभाग दुर्ग कार्यालय के अंतर्गत संचालित उचित मूल्य दुकानों में हुई गंभीर वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितताओं तथा... संलिप्त अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही बाबत खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग, महानदी भवन, नवा रायपुर (छ.ग.) स्तर से पहला कर दी गई है… जिसके तहत खाद्य नियंत्रक दुर्ग ने 24 उचित मूल्य दुकानों के संचलन के लिए नवीन स्व सहायता समूहों को आमंत्रित किया है… पढ़िए पूर्वानुमानित विश्लेषण

खाद्य नियंत्रक दुर्ग कार्यालय के दोषी अधिकारियों को पकड़ने की चौतरफा विभागीय कार्यवाही वास्तविकता के धरातल की ओर चल पड़ी है… जांच कार्यवाही की रूपरेखा पर प्रकाश डालने वाले पहलुओं को इस प्रकार समझा जा सकता है… खाद्य विभाग दुर्ग कार्यालय के अंतर्गत संचालित शासकीय उचित मूल्य दुकानों के संचालन को लेकर विगत कई वर्षों से लगातार गंभीर शिकायतें प्राप्त हो रही थीं। स्थानीय स्तर पर सक्षम अधिकारियों की कथित मिलीभगत और संरक्षण के कारण ये जांच कार्यवाहियां लंबे समय से लंबित पड़ी हुई थीं। अत्यंत हर्ष का विषय है कि, विभागीय शीर्ष अधिकारियों एवं सचिवालय के संज्ञान में आने के बाद इस पूरे तंत्र में व्याप्त जिला स्तरीय गंभीर गड़बड़ियों का खुलासा हुआ है। वर्तमान में इस विभागीय कार्यवाही के दो अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू सामने आए हैं, जो सराहनीय हैं: पहला पहलू: पारदर्शिता एवं जवाबदेही तथा शासकीय कोष को क्षति पहुंचाने वाले को कानूनी शिकंजे लाना सुनिश्चित करने हेतु २४ उचित मूल्य दुकानों के नए संचालनकर्ता की नियुक्ति के लिए प्रेस विज्ञप्ति जारी की जा चुकी है। दूसरा पहलू: जांच में पकड़ी गई गड़बड़ियों को लंबे समय तक...

कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा बनाए रखने के लिए सभी की भागीदारी और जनजागृति आवश्यक है… जिसके लिए एक पहल हमारे द्वारा की जा रही है…

क्या आप महिला सुरक्षा कानून के तहत प्राधिकृत शासकीय समिति के सदस्य बनकर सामाजिक योगदान देना चाहते है… तो यह लेख आपको नई दिशा दिखा सकता है… इसलिए इसे पूरा पढ़िएगा… प्रतिबद्धता का विषय गरिमापूर्ण कामकाजी वातावरण वाला सुरक्षित और सर्व सुविधायुक्त कार्यस्थल महिलाओं को तभी मिल सकता है… जब हम महिला सुरक्षा के कानून को जान लेंगे और समझ जायेंगे व कानून के प्रावधानों को व्यवहारिक बनाने में नागरिक जिम्मेदारी निभायेंगे; सतत कानूनी निगरानी बनाए रखने के लिए हमारा योगदान जरूरी है   उल्लेखनीय है कि, भारत में महिलाओं की सुरक्षा और गरिमापूर्ण कामकाजी वातावरण बनाने के लिए सशक्त कानून है… जिनका उद्देश्य महिलाओं को न्यायिक संरक्षण देने के साथ-साथ व्यवहारिक संरक्षण भी उपलब्ध करवाना है… इसलिए इन सभी नियमों और कानूनी प्रावधानों को जानना सभी के लिए आवश्यक है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की निकट संबंधी कोई न कोई महिला होती है जिसकी सुरक्षा और गरिमापूर्ण सामाजिक स्थिति को बनाए रखना उसकी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी होती है इसलिए अग्रलिखित कानून से आप भी परिचित हो जाइए : लैंगिक भेदभाव नहीं:   संविधान म...

एक आरटीआई आवेदन मे केवल एक विषय की जानकारी मांगियें ? ऐसा क्यों ?

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत छत्तीसगढ़ राज्य में किया जाने वाला अनुरोध अर्थात RTI आरटीआई आवेदन केवल एक विषय वस्तु का होना चाहिए ऐसा क्यों ⁉️ सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत छत्तीसगढ़ राज्य में किया जाने वाला अनुरोध अर्थात RTI आरटीआई आवेदन केवल एक विषय वस्तु का होना चाहिए छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने इसके लिए स्पष्ट नियम बनाए है उसमे लिखा है कि :-  अनुरोध केवल एक विषयवस्तु से संबंधित हो :-  सूचना के लिये अधिनियम की धारा (6) के अंतर्गत अनुरोध लिखित में एक विषयवस्तु से संबंधित रहेगा एवं वह सामान्यतः एक सौ पचास शब्दों से अधिक नहीं होगा. यदि कोई आवेदक एक से अधिक विषयवस्तु की सूचना चाहता है, तो वह इनके लिये अलग-अलग आवेदन करेगा.                    🎯 परन्तु अनुरोध एक से अधिक विषयवस्तु से संबंधित होने की स्थिति में जन सूचना अधिकारी केवल प्रथम विषयवस्तु के संबंध में उत्तर देगा तथा अन्य प्रत्येक विषयवस्तु के लिए आवेदक को अलग-अलग आवेदन करने हेतु सलाह दे सकेगा. --------------------------------- कब सूचना अधिकारी आपका आवेद...

ट्विटरचे निवेदन म्हणजे जगातील सर्वात मोठ्या लोकशाहीवर आपल्या अटी लादण्याचा प्रयत्न आहे.

ट्विटरला देशातील कायद्याचे पालन करावे लागेल ट्विटरने जारी केलेले निवेदन निराधार, खोटे आणि स्वतःची चूक लपवण्यासाठी भारताची बदनामी करण्याचा प्रयत्न असल्याचे सांगत केंद्र सरकारकडून निषेध व्यक्त Posted Date:- May 27, 2021   ट्विटरने आज आपल्या प्रसिद्धी पत्रकात केलेल्या दाव्यांचा सरकारने जोरदार विरोध केला आहे. अनेक शतकांपासून अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य आणि लोकशाही पद्धतींची वैभवशाली परंपरा भारतामध्ये आहे. भारतात अभिव्यक्ती स्वातंत्र्याचे रक्षण करणे केवळ ट्विटर सारख्या खासगी, नफ्यासाठी काम करणाऱ्या परकीय संस्थेचा विशेष अधिकार नाही, तर ही जगातील सर्वात मोठी लोकशाहीची आणि तिच्या मजबूत संस्थांची बांधिलकी आहे. ट्विटरचे निवेदन म्हणजे जगातील सर्वात मोठ्या लोकशाहीवर आपल्या अटी लादण्याचा प्रयत्न आहे. आपल्या कृतीतून आणि हेतुपुरस्सर अवहेलना करून ट्विटर भारताची कायदेशीर व्यवस्था धोक्यात आणण्याचा प्रयत्न करत आहे. शिवाय, ट्विटरने सोशल मीडिया इंटरमिडीअरी मार्गदर्शक तत्त्वांच्या त्या नियमांचे पालन करण्यास नकार दिला आहे ज्याच्या आधारे ते भारतातील कोणत्याही गुन्हेगारी दायित्वापासून स्वतःल...

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