छत्तीसगढ़ में उचित मूल्य दुकानों का संचालन करने वाली स्व सहायता समूहों के साथ खाद्य विभाग के अधिकारियों द्वारा कि जा रही है प्रशासकीय धोखाधड़ी जानिए कैसे…?
महिला समूहों को... उनके दुकान के प्रतिमाह का... वित्तीय विवरण खाद्य विभाग देता है क्या ?
गड़बड़ियों के पिटारे में से…
छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत संचालित शासकीय उचित मूल्य दुकानों (राशन दुकानों) में खाद्य विभाग के कुछ अधिकारियों/ कर्मचारियों और स्व-सहायता समूहों (SHGs) के बीच समन्वय और गड़बड़ी के कई मामले सामने आते रहे हैं। इस विषय को दोनों पक्षों के पहलुओं से समझा जाना आवश्यक है। तभी सार्थक हल निकलना संभव होगा । एक तरफ जहां कुछ समूहों द्वारा वाकई अनियमितता किए जाने की बात सामने आती है, तो वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं और समूहों के शोषण व प्रशासनिक दबाव की शिकायतें भी उठती रही हैं। जिसका असल कारण यह है कि, महिला समूहों को प्रतिमाह लेन देन का वित्तीय विवरण खाद्य नियंत्रक कार्यालय से उपलब्ध नहीं कराया जाता है और ऐसे मासिक विवरण की जानकारी सार्वजनिक करने की जिम्मेदारी खाद्य विभाग पूरी नहीं कर रहा है । इस गंभीर विषय ओर खाद्य नियंत्रक प्रश्नांकित है ।
छत्तीसगढ़ के जमीनी परिदृश्य और इस पूरे विषय के मुख्य बिंदु बेहद चिंताजनक हैं गड़बड़ियां कई स्तरों पर हो रहीं है प्रमुख कारणों का विश्लेषण यहां किया जा रहा है जिससे असल मामले पर प्रकाश पड़े ।
1. अधिकारियों और बिचौलियों द्वारा शोषण की शिकायते कितनी तथ्यात्मक हैं ?
अधिकांशत: महिला स्व-सहायता समूहों से जुड़ी जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा यह आरोप लगाया जाता रहा है कि, खाद्य विभाग के निचले स्तर के अधिकारी व बिचौलिए उनको जटिल ऑनलाइन वित्तीय व्यवस्थाओं के आधार पर मानसिक दबाव में लाकर उनका आर्थिक शोषण करते हैं क्योंकि उचित मूल्य दुकानों का संचालन करने की विधिवत ट्रेनिंग महिला समूहों के सदस्यों को नहीं मिलती है। विडंबना यह भी है कि, समूहों द्वारा कि जा रही खरीदी बिक्री का प्रमाणित विवरण खाद्य विभाग नहीं देता है । खाद्य नियंत्रक इस मामले में मूकदर्शक है ।
2/ मानसिक दबाव के आधार पर कमीशनखोरी का धंधा आसान हो जाता है ।
अधिकांश मामलों में महिला समूहों की ओर से आरोप लगते हैं कि, दुकानों के आवंटन, स्टॉक वेरिफिकेशन (भौतिक सत्यापन) जैसे आधारभूत दस्तावेज प्रमाण खाद्य नियंत्रक कार्यालय उपलब्ध नहीं करता है । जिसके कारण ऑनलाइन संधारित आंकड़ों की गलती बताकर डराया जाता है। इसके साथ-साथ समय पर खाद्यान्न की आपूर्ति (लॉट जारी करने) के बदले अनुचित दबाव बनाया जाता है या कमीशन की मांग की जाती है।
3/ कम स्टॉक की जबरन आपूर्ति मामलों का जवाब देने वाला कोई नहीं है ।
कई बार समूहों द्वारा शिकायत की जाती है कि, गोदामों (नान/FCI) से राशन दुकानों तक जो माल भेजा जाता है, वह तौल में पहले से ही कम होता है (शॉर्टेज) लेकिन अधिकारियों और परिवहनकर्ताओं के दबाव में समूहों को पूरे स्टॉक की पावती (रसीद) पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। बाद में जब जांच होती है, तो स्टॉक कम मिलने का ठीकरा सीधे स्व-सहायता समूह पर फोड़ दिया जाता है।
4/ प्रशासनिक जटिलताएँ और तकनीकी कमियाँ महिला समूहों के शोषण का पूरा इंतजाम करती हैं।
पीओएस (POS) मशीन सर्वर डाउन होने, फिंगरप्रिंट न मैच होने जैसी तकनीकी दिक्कतों के कारण जब मैन्युअल वितरण या ऑफलाइन डेटा एंट्री में अंतर आता है, जिसकी सुनवाई करने की जिम्मेदारी पूरी की गई है क्या यह प्रश्न अनुत्तरित है परिणामस्वरूप कई बार बिना गहन जांच के समूहों को ही जिम्मेदार मानकर उन पर गबन का मामला दर्ज करा दिया जाता है।
5/. राशन घोटाले और कानूनी कार्यवाही में अधिकारियों व विक्रेताओं की भूमिका शंकासपद है ।
बेहद चौंकाने वाली स्थिति है कि, छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों (जैसे दुर्ग, जांजगीर-चांपा, सरगुजा, कोरबा आदि) में खाद्य विभाग के भौतिक सत्यापन में बड़े स्तर पर राशन गायब होने के मामले भी लगातार उजागर होते रहते हैं लेकिन इन मामलों में किन लोगों के विरुद्ध परिवाद दायर किया गया है और कार्यवाही की गई है यह जानकारी सामने नहीं आती है । कार्यवाही के नाम पर महिला समूहों से दुकान वापस लेकर संलग्नीकरण किया जाता है परंतु दंडात्मक कार्यवाही किसके विरुद्ध की गई है यह गहन खोज का विषय है ।
6/ लाखों का गबन मन घड़ंत आरोप है कि, वास्तविकता है ?
जांच टीमों को अक्सर भौतिक सत्यापन के दौरान शक्कर, चावल, नमक और अन्य सामान के स्टॉक में भारी कमी मिलती है, क्योंकि महिला समूहों को प्रत्येक लेनदेन पर कोई विवरण खाद्य नियंत्रक कार्यालय द्वारा प्रति माह महिला समूहों को नहीं दिया जाता है और जटिल ऑनलाइन प्रक्रिया महिला समूहों को समझना मुश्किल होता है इसलिए महिला समूह जानकारी के आभाव में विरोध करने से वंचित रह जाती है ।
7/ अधिकारियों की मिलीभगत और एफआईआर करवाने वाली कार्यवाही का इंतजार है ।
जब मामले गंभीर होते हैं, तो कलेक्टरों और खाद्य नियंत्रकों के निर्देश पर समूहों के अध्यक्ष, विक्रेताओं और इसमें शामिल विभागीय कर्मचारियों या बिचौलियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं (जैसे धोखाधड़ी) और आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत पुलिस केस दर्ज करवाए जाने का प्रावधान है लेकिन ऐसे मामलों में भी प्रतिमाह के स्टॉक विवरण का लेखा जोखा जटिल ऑनलाइन व्यवस्था के तहत संधारित होने से असल मामला सामने नहीं आता है । इसलिए कार्यवाही करने वाले प्रावधान अभी कानूनी किताबों तक सीमित है । खाद्य नियंत्रक दुर्ग को इस विधिक विषम परिस्थितियों से अवगत करवाया गया है और प्रतिक्रिया की जा रहीं है ।
8/ विश्लेषक अमोल मालूसरे के अनुसार मुख्य चुनौती स्व-सहायता समूह मुख्यत मासिक, अर्धवार्षिक और वार्षिक संपरीक्षा रिपोर्ट दिलवाना है ।
ग्रामीण और कम पढ़ी-लिखी या कम प्रशासनिक अनुभव वाली महिलाओं द्वारा राशन दुकान संचालित होते हैं। ऐसे में नियमों की पेचीदगियों का फायदा उठाकर कुछ असामाजिक तत्व या भ्रष्ट अधिकारी उन्हें कागजी हेराफेरी में फंसा देते हैं, जिससे असली दोषी बच निकलते हैं और उचित मूल्य दुकानों का संचालन करने वाली समूह की महिलाओं को कानूनी कार्यवाहियों के साथ वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ता है। इस समस्या का समाधान है स्व-सहायता समूह को उनके द्वारा संचालित उचित मूल्य दुकानों की मासिक, अर्धवार्षिक और वार्षिक संपरीक्षा रिपोर्ट दिलवाना है ।
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